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द्रोण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
निर्दिष्टं यद्वृषाङ्केन पुण्यं सर्वार्थसाधकम् |  ६७   क
तज्जग्मतुरसम्भ्रान्तौ नरनाराय़णावृषी ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति