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शान्ति पर्व
अध्याय २४५
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व्यास उवाच
स्वपतां जाग्रतां चैव सर्वेषामात्मचिन्तितम् |  ५   क
प्रधानद्वैधय़ुक्तानां जहतां कर्मजं रजः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति