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वन पर्व
अध्याय २१३
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मार्कण्डेय़ उवाच
अग्नीनां विविधो वंशः कीर्तितस्ते मय़ानघ |  १   क
शृणु जन्म तु कौरव्य कार्त्तिकेय़स्य धीमतः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति