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शल्य पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
तत्कर्म शाल्वस्य समीक्ष्य सर्वे; पाञ्चालमत्स्या नृप सृञ्जय़ाश्च |  २१   क
हाहाकारैर्नादय़न्तः स्म युद्धे; द्विपं समन्ताद्रुरुधुर्नराग्र्याः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति