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वन पर्व
अध्याय २४५
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वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मरुचय़ो मूढास्तिर्यग्गतिपराय़णाः |  १८   क
कृच्छ्रां योनिमनुप्राप्य न सुखं विन्दते जनाः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति