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वन पर्व
अध्याय २४५
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व्यास उवाच
दानान्न दुष्करतरं पृथिव्यामस्ति किञ्चन |  २७   क
अर्थे हि महती तृष्णा स च दुःखेन लभ्यते ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति