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वन पर्व
अध्याय २४५
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वैशम्पाय़न उवाच
संस्मरन्परुषा वाचः सूतपुत्रस्य पाण्डवः |  ५   क
निःश्वासपरमो दीनो विभ्रत्कोपविषं महत् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति