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शान्ति पर्व
अध्याय २४६
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व्यास उवाच
पृथग्भूतं यदा वुद्ध्या मनो भवति केवलम् |  १४   क
तत्रैनं विवृतं शून्यं रजः पर्यवतिष्ठते ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति