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वन पर्व
अध्याय २४६
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व्यास उवाच
तच्छतान्यपि भुञ्जन्ति व्राह्मणानां मनीषिणाम् |  १०   क
मुनेस्त्यागविशुद्ध्या तु तदन्नं वृद्धिमृच्छति ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति