वन पर्व  अध्याय २४६

व्यास उवाच

तं तु शुश्राव धर्मिष्ठं मुद्गलं संशितव्रतम् |  ११   क
दुर्वासा नृप दिग्वासास्तमथाभ्याजगाम ह ||  ११   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति