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वन पर्व
अध्याय २४६
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व्यास उवाच
निराहारस्तु स मुनिरुञ्छमार्जय़ते पुनः |  १९   क
न चैनं विक्रिय़ां नेतुमशकन्मुद्गलं क्षुधा ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति