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वन पर्व
अध्याय २४६
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व्यास उवाच
न चास्य मानसं किञ्चिद्विकारं ददृशे मुनिः |  २२   क
शुद्धसत्त्वस्य शुद्धं स ददृशे निर्मलं मनः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति