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द्रोण पर्व
अध्याय १४५
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सञ्जय़ उवाच
स विसृष्टो वलवता शरो घोरो महामृधे |  ११   क
भासय़ामास तत्सैन्यं दिवाकर इवोदितः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति