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शान्ति पर्व
अध्याय २४७
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भीष्म उवाच
अपां शैत्यं रसः क्लेदो द्रवत्वं स्नेहसौम्यता |  ४   क
जिह्वा विष्यन्दिनी चैव भौमाप्यास्रवणं तथा ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति