आदि पर्व  अध्याय २१६

वैशम्पाय़न उवाच

परिगृह्य समाविष्टस्तद्वनं भरतर्षभ |  ३३   क
मेघस्तनितनिर्घोषं सर्वभूतानि निर्दहन् ||  ३३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति