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वन पर्व
अध्याय २४७
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देवदूत उवाच
न च स्वेदो न दौर्गन्ध्यं पुरीषं मूत्रमेव च |  १४   क
तेषां न च रजो वस्त्रं वाधते तत्र वै मुने ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति