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वन पर्व
अध्याय २४७
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देवदूत उवाच
न म्लाय़न्ति स्रजस्तेषां दिव्यगन्धा मनोरमाः |  १५   क
पर्युह्यन्ते विमानैश्च व्रह्मन्नेवंविधाश्च ते ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति