अनुशासन पर्व  अध्याय १४

वासुदेव उवाच

अथ गव्यं पय़स्तात कदाचित्प्राशितं मय़ा |  ७९   क
ततः पिष्टरसं तात न मे प्रीतिमुदावहत् ||  ७९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति