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वन पर्व
अध्याय २४७
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देवदूत उवाच
पुरस्ताद्व्रह्मणस्तत्र लोकास्तेजोमय़ाः शुभाः |  १८   क
यत्र यान्त्यृषय़ो व्रह्मन्पूताः स्वैः कर्मभिः शुभैः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति