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वन पर्व
अध्याय २४७
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देवदूत उवाच
कृतस्य कर्मणस्तत्र भुज्यते यत्फलं दिवि |  २८   क
न चान्यत्क्रिय़ते कर्म मूलच्छेदेन भुज्यते ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति