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वन पर्व
अध्याय २४७
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देवदूत उवाच
नातप्ततपसः पुंसो नामहाय़ज्ञय़ाजिनः |  ३   क
नानृता नास्तिकाश्चैव तत्र गच्छन्ति मुद्गल ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति