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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४२
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सूत उवाच
नित्येऽस्मिन्पञ्चके वर्गे नित्ये चात्मनि यो नरः |  १३   क
अस्य नानासमाय़ोगं यः पश्यति वृथामतिः |  १३   ख
विय़ोगे शोचतेऽत्यर्थं स वाल इति मे मतिः ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति