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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २५
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वैशम्पाय़न उवाच
कर्मणा मनसा वाचा चक्षुषा चापि ते नृप |  १६   क
संनिय़म्येन्द्रिय़ग्राममास्थिताः परमं तपः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति