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वन पर्व
अध्याय २४८
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः स राजा सिन्धूनां वार्द्धक्षत्रिर्जय़द्रथः |  ११   क
विस्मितस्तामनिन्द्याङ्गीं दृष्ट्वासीद्धृष्टमानसः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति