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वन पर्व
अध्याय २४८
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वैशम्पाय़न उवाच
स कोटिकाश्यं राजानमव्रवीत्काममोहितः |  १२   क
कस्य त्वेषानवद्याङ्गी यदि वापि न मानुषी ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति