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वन पर्व
अध्याय २४८
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वैशम्पाय़न उवाच
स कोटिकाश्यस्तच्छ्रुत्वा रथात्प्रस्कन्द्य कुण्डली |  १७   क
उपेत्य पप्रच्छ तदा क्रोष्टा व्याघ्रवधूमिव ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति