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वन पर्व
अध्याय २४८
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वैशम्पाय़न उवाच
महता परिवर्हेण राजय़ोग्येन संवृतः |  ७   क
राजभिर्वहुभिः सार्धमुपाय़ात्काम्यकं च सः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति