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शान्ति पर्व
अध्याय २४९
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नारद उवाच
त्वं हि संहारवुद्ध्या मे चिन्तिता रुषितेन च |  १९   क
तस्मात्संहर सर्वास्त्वं प्रजाः सजडपण्डिताः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति