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शान्ति पर्व
अध्याय २४९
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स्थाणुरु उवाच
तव तेजोग्निना देव प्रजा दह्यन्ति सर्वशः |  २   क
ता दृष्ट्वा मम कारुण्यं मा कुप्यासां जगत्प्रभो ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति