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वन पर्व
अध्याय २४९
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कोटिकाश्य उवाच
अङ्गारकः कुञ्जरगुप्तकश्च; शत्रुञ्जय़ः सञ्जय़सुप्रवृद्धौ |  १०   क
प्रभङ्करोऽथ भ्रमरो रविश्च; शूरः प्रतापः कुहरश्च नाम ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति