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वन पर्व
अध्याय २४९
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कोटिकाश्य उवाच
धातुर्विधातुः सवितुर्विभोर्वा; शक्रस्य वा त्वं सदनात्प्रपन्ना |  ४   क
न ह्येव नः पृच्छसि ये वय़ं स्म; न चापि जानीम तवेह नाथम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति