शान्ति पर्व  अध्याय १६०

वैशम्पाय़न उवाच

ततस्तद्दानवानीकं सम्प्रणेतारमच्युतम् |  ५३   क
रुद्रखड्गवलोद्धूतं प्रचचाल मुमोह च ||  ५३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति