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शान्ति पर्व
अध्याय २६७
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असित उवाच
नैव सञ्जाय़ते जन्तुर्न च जातु विपद्यते |  ३६   क
याति देहमय़ं भुक्त्वा कदाचित्परमां गतिम् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति