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वन पर्व
अध्याय २७५
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मार्कण्डेय़ उवाच
मामासाद्य पतिं भद्रे न त्वं राक्षसवेश्मनि |  ११   क
जरां व्रजेथा इति मे निहतोऽसौ निशाचरः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति