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शान्ति पर्व
अध्याय २५
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वैशम्पाय़न उवाच
यत्कर्म वै निग्रहे शात्रवाणां; योगश्चाग्र्यः पालने मानवानाम् |  २४   क
कृत्वा कर्म प्राप्य कीर्तिं सुय़ुद्धे; वाजिग्रीवो मोदते देवलोके ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति