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शान्ति पर्व
अध्याय २५
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वैशम्पाय़न उवाच
हुत्वा तस्मिन्यज्ञवह्नावथारी; न्पापान्मुक्तो राजसिंहस्तरस्वी |  २७   क
प्राणान्हुत्वा चावभृथे रणे स; वाजिग्रीवो मोदते देवलोके ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति