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शान्ति पर्व
अध्याय २५
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वैशम्पाय़न उवाच
राष्ट्रं रक्षन्वुद्धिपूर्वं नय़ेन; सन्त्यक्तात्मा यज्ञशीलो महात्मा |  २८   क
सर्वाँल्लोकान्व्याप्य कीर्त्या मनस्वी; वाजिग्रीवो मोदते देवलोके ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति