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शान्ति पर्व
अध्याय २५
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वैशम्पाय़न उवाच
विद्वांस्त्यागी श्रद्दधानः कृतज्ञ; स्त्यक्त्वा लोकं मानुषं कर्म कृत्वा |  ३०   क
मेधाविनां विदुषां संमतानां; तनुत्यजां लोकमाक्रम्य राजा ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति