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शान्ति पर्व
अध्याय २५
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वैशम्पाय़न उवाच
जित्वा सङ्ग्रामान्पालय़ित्वा प्रजाश्च; सोमं पीत्वा तर्पय़ित्वा द्विजाग्र्यान् |  ३२   क
युक्त्या दण्डं धारय़ित्वा प्रजानां; युद्धे क्षीणो मोदते देवलोके ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति