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शान्ति पर्व
अध्याय २५
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वैशम्पाय़न उवाच
वृत्तं यस्य श्लाघनीय़ं मनुष्याः; सन्तो विद्वांसश्चार्हय़न्त्यर्हणीय़ाः |  ३३   क
स्वर्गं जित्वा वीरलोकांश्च गत्वा; सिद्धिं प्राप्तः पुण्यकीर्तिर्महात्मा ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति