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अनुशासन पर्व
अध्याय २५
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भीष्म उवाच
आत्मजां रूपसम्पन्नां महतीं सदृशे वरे |  ९   क
न प्रय़च्छति यः कन्यां तं विद्याद्व्रह्मघातिनम् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति