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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २५
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वैशम्पाय़न उवाच
त्वगस्थिभूतः परिशुष्कमांसो; जटाजिनी वल्कलसंवृताङ्गः |  १७   क
स पार्थिवस्तत्र तपश्चचार; महर्षिवत्तीव्रमपेतदोषः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति