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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २५
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वैशम्पाय़न उवाच
स तैः परिवृतो राजा कथाभिरभिनन्द्य तान् |  ३   क
अनुजज्ञे सशिष्यान्वै विधिवत्प्रतिपूज्य च ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति