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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २५
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वैशम्पाय़न उवाच
तथैवान्ये पृथक्सर्वे तीर्थेष्वाप्लुत्य भारत |  ५   क
चक्रुः सर्वाः क्रिय़ास्तत्र पुरुषा विदुरादय़ः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति