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कर्ण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
द्विसाहस्रान्समरे सव्यसाची; कुरुप्रवीरानृषभः कुरूणाम् |  ४३   क
क्षणेन सर्वान्सरथाश्वसूता; न्निनाय़ राजन्क्षय़मेकवीरः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति