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सभा पर्व
अध्याय २५
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वैशम्पाय़न उवाच
सरो मानसमासाद्य हाटकानभितः प्रभुः |  ५   क
गन्धर्वरक्षितं देशं व्यजय़त्पाण्डवस्ततः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति