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वन पर्व
अध्याय २५
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वैशम्पाय़न उवाच
तं सत्यसन्धं सहिताभिपेतु; र्दिदृक्षवश्चारणसिद्धसङ्घाः |  २२   क
वनौकसश्चापि नरेन्द्रसिंहं; मनस्विनं सम्परिवार्य तस्थुः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति