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भीष्म पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
स कार्मुकवरोत्सृष्टैर्नवभिर्निशितैः शरैः |  ६७   क
समाहतो भृशं राजन्कलिङ्गेन महाय़शाः |  ६७   ख
सञ्चुक्रुधे भृशं भीमो दण्डाहत इवोरगः ||  ६७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति