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शल्य पर्व
अध्याय ३५
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वैशम्पाय़न उवाच
तय़ोश्चिन्ता समभवद्दृष्ट्वा पशुगणं महत् |  २०   क
कथं न स्युरिमा गाव आवाभ्यां वै विना त्रितम् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति