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वन पर्व
अध्याय २५
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्ते प्रत्युवाच धर्मराजं धनञ्जय़ः |  ४   क
गुरुवन्मानवगुरुं मानय़ित्वा मनस्विनम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति