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वन पर्व
अध्याय २५
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अर्जुन उवाच
भवानेव महर्षीणां वृद्धानां पर्युपासिता |  ५   क
अज्ञातं मानुषे लोके भवतो नास्ति किञ्चन ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति